दिल ही तो है…

आज का पोस्ट कोई कहानी नहीं। आज मुझे ग़ालिब की महान शायरी को आपके सामने पेश करते हुए ख़ुशी महसूस हो रहा है। ग़ालिब ताउम्र फ़क़ीरों की तरह जिये और फ़क़ीर की तरह ही अलविदा कह गए। आज उनकी इस शायरी को पढ़ कर हम ग़ालिब की बेफ़िक्री और मस्तमौला पन को महसूस कर सकते है।


दिल ही तो है न संगों-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यों

रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों?

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्ता नहीं

बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों?

जब वो जमाले-दिलफ़रोज़ सूरते-मेहरे-नीम रोज़

आप ही हो नज़ारा-सोज़, पर्दे में मुँह छिपाये क्यों?

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जांसिता, नावके-नाज़ बे-पनाह

तेरा ही अक्से-रुख़ सही, सामने तेरे आये क्यों?

क़ैदे-हयातो बन्दे-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यों?

हुस्न और उसपे हुस्न-ज़न रह गई बुल्हवस की शर्म

अपने पे एतमाद है ग़ैर को आज़माये क्यों?

वां वो ग़ुरूर-ए-इज़्‍ज़ो-नाज़ यां ये हिजाब-पासे-वज़अ़

राह में हम मिले कहां, बज़्म में वो बुलाये क्यों?

हां वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही

जिसको हो दिनों-दिल अज़ीज़ उसकी गली में जाये क्यों?

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन-से काम बन्द हैं

रोइए ज़ार-ज़ार क्या कीजिए हाय-हाय क्यों?


मेरा ग़ालिब को सलाम जिन्होंने दर्द को जीते हुए भी ऐसी उम्दा रचना कर हम सबको उनका क़ायल कर दिया।

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