वो काली रात… (Episode-2)

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(continued…)

उस घुप्प अंधेरे कमरे में बंद मैं सिया के बारे में सोच रहा था… याद कर रहा था उस दिन को जब मुझे होश आया था। वो सिया ने मुझे बनाया था। वही थी जिसने मुझ में जान फूँकी। मैं नहीं जानता कि ऐसा उसने जान-बूझ कर किया या अंजाने में।

वो रात मुझे आज भी याद है। वो काली रात जब सिया ने मेरे आँखों की जगह पर दो तिरझी डंड़ियाँ सीं कर कट्टम का निशान बना दिया। मुझे उसके तुरंत बाद होश आ गया था। मुझे तब नहीं पता था कि मैं कौन हूँ और वहाँ क्या कर रहा हूँ। उस दिन सिया मुझे देख रही थी और मैं सोच रहा था कि वो कितनी सुंदर है।

मैं भले ही हिल-डुल नहीं सकता था पर मैं बातें कर सकता था। सिया मुझसे बातें करती थी। पर फिर आई मिष्ठी। मैं उससे रोज बातें किया करता था। वो नन्हीं सी लड़की मुझ से रोज कहानियाँ सुनाने को कहती थी। मैं उसके कहानी नहीं सुना सकता था। मेरे पास उसे सुनाने के लिये कुछ भी नहीं होता था। पर मेरे पास मुझे दुःस्वप्न थे। वे दुःस्वप्न जिनको देखकर मेरी रूह काँप जाती थी।

जाने कितने दिन से यही सब चल रहा था। मिष्ठी मुझ से कहानी सुनने के लिये ज़िद करती और कहानी सुनने के बाद सिया उसे सुलाने के लिये ले जाती। आज कुछ तो हुआ था। मिष्ठी आज मुझसे मिलने नहीं आई थी। पर मेरी बेचैनी बहुत ज़्यादा समय तक के लिये नहीं थी। मुझे कमरे की ओर कदमों के आने की आवाज़ सुनाई दी।

“मिष्ठी! आज कहाँ रह गई थी, मेरी बच्ची।”—मैं ने पूछा।

और दरवाजा खुला तो मेरा धागे का बना दिल धक्क-सा रह गया।


To be Continued…

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