उम्र (निष्कर्ष)

नोटः- यह कहानी सच्ची घटना से प्रेरित है। समानताएँ महसूस होंगी पर ये कहानी काल्पनिक है।

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अब तकः सोनम एक बहुत ही सीधी लड़की थी, पर जब उसके पिता ने उसको शादी में ढकेलने की कोशिश की तोअंततः उसे घर को छोड़ कर जाना पड़ा। पर फ़िर सोनम के पिता ने उसको अपने साथ जबरन ले जाने के लिये झूठा मुकदमा लिखा दिया। सोनम हारी नहीं थी पर उसे लग रहा था कि वो इस जंग को हार सकती है।अब आगे…


सोनम को अपने पिता की बात सुन कर अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। वो मन-ही-मन सोच रही थी कि क्या वाक़ई यही पिता होता है? इतने दिनों बाद अब भी उसके पिता का मन बिना बताए ज़बरन शादी कराने से बता कर ज़बरन शादी कराने तक ही पहुँचा था। सोनम ने कुछ भी नहीं कहा और वो पेशी के लिये सोमी के साथ कोर्ट की तरफ हुई।

“तुम्हें पता है कि तुम इस मलीन बस्ती के नाजायज़ पिल्ले के साथ क्यों नहीं रह सकती। बात मान जाओ मेरी, वरना मेरी प्रॉपर्टी से एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी। तुम्हारे पास जीतने के लिये कुछ नहीं है, पर जब हारोगी तो बचा खुचा भी खो दोगी।”—सोनम के पिता ने उसे ग़ुस्से के साथ चेताते हुए रोका।

जिस किसी ने भी सोनम के पिता को सुना उसे यही लगा कि पिता कोरी धमकी दे रहा था। पर सोनम जानती थी कि उसके पिता ने इशारे में उससे क्या कहा था। वो जानती थी कि वो सोमी को मुसीबत से नहीं निकाल सकती। ऑफर अच्छा था। अगर सोनम अपने सबसे बुरे दिन नहीं जी रही थी तो बहुत अच्छे दिन भी नहीं थे। पिता ने उसे पिंजरे में आने का बुलावा दिया था, सोने के आरामदायक पिंजरे में।

“तुम अपने पिता की बात मान क्यों नहीं लेती? वो सही कह रहे हैं। मैं भी जानता हूँ वो किस बारे में बात कर रहे हैं। मैं ने तुम्हारी मार्कशीट देखी है। शायद हमारा साथ यहीं तक था।”—सोमी ने कहा।

“अंदर जो भी हो, याद रखना, हम फिर मिलेंगे।”—सोनम ने सोमी से कहा।

और दोनों जज साहब के सामने पहुँचे। इल्ज़ाम था सोमी पर कि उसने धारा 363 और 366 आई०पी०सी० यानि अपहरण और बलात्कार का गंभीर अपराध किया है। सोमी को नहीं पता था पर सोनम जानती थी कि सोमी कितनी बड़ी मुसीबत में था। उसको अपने पिता का ऑफर याद आया। शायद कोई साधारण अनजान लड़की उस पिता के ऑफर को अपना भी लेती… पर सोनम अब साधारण लड़की नहीं थी।

जज साहब ने जैसे ही अपने मेज़ पर रखी केस-फ़ाइल को पलटा। उन्होनें कुछ सवाल किया और सब ठीक था, पर अचानक एक कागज़ को देश उनकी भवें तन गई। जज साहब बोले—“हाई स्कूल की मार्कशीट के हिसाब से तो पीड़िता नाबालिग़ है। सिर्फ़ तेरह साल। दोनों कहाँ हैं?”

और सोनम सोमी के साथ में जज साहब के सामने पहुँची।

जज साहब बोले—“आपकी उम्र तेरह साथ है। आप अभियुक्त के साथ कैसे चली गईं?”

इस पर सोनम बोली—“क्या आपको मेरी उम्र तेरह साल लगती है।”

इस पर जज साहब की भवें और तन गई। जज साहब बोले—“आपकी उम्र आपकी हाईस्कूल की मार्कशीट के हिसाब से तेरह साल है।”

सोनम को पता था कि उसके पास अब बताने के लिये ज़्यादा कुछ नहीं है। वो बोली—“मेरी उम्र तेरह साल नहीं है। मैं बीस साल की हूँ। आपके सामने रखी मार्कशीट में मेरी उम्र मेरे पिता ने भरी थी।”

और जज साहब के माथे पर शिकन आ गई।

जज साहब बोले—“हमारे पास आपकी बात मानने की कोई वजह नहीं। तेरह साल की उम्र की लड़की को भले अभियुक्त के साथ मर्ज़ी से गई हो या नहीं, फ़र्क़ नहीं पड़ता। तेरह साल की लड़की की सहमति कोर्ट में मान्य नहीं है। लड़के-लड़की ने यह याचिका प्रोटेक्शन के लिये की है। शादी को कोई प्रमाण आपने नहीं दिया। ऐसे में कोर्ट ये याचिका ख़ारिज करने के पक्ष में है।” और जज साहब सोनम की ओर मुड़ कर बोले—“आप के माता-पिता कोर्ट में मौजूद हैं?”

इस पर सोनम ने कोर्ट में पीछे खड़े अपने पिता को आँखें तरेरते हुए कहा—“जी हाँ। यहीं है। मेरे पिता कोर्ट में मौजूद हैं।”

जज साहब ने सोनम से पूछा—“आपके पास एक ही रास्ता हैं। आप अपने पिता के साथ चली जाइये।”

और सोनम के पिता के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

“सवाल ही नहीं उठता। किसी सूरत में नहीं।”—सोनम ने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा।

“आप समझ रही हैं कि नहीं? हम आपको अभियुक्त के साथ नहीं जाने दे सकते। आप अभी नाबालिग़ हैं।”—जज साहब ने कहा।

“आप मुझे जेल भेज दीजिये पर मैं अपने पिता के साथ नहीं जाऊँगी।”—सोनम ने ठंडे अंदाज में कहा।

“कोई जेल नहीं जा रहा।”—जज साहब ने कहा। वो कोर्ट से मुख़ातिब हुए और उन्होंने बोलना शुरु किया।—“कोर्ट के सामने आज बड़ा ही विचित्र मामला आया है। याचीगण सोनम एवं सोमी प्रथम सूचना रिपोर्ट के ख़िलाफ़ कोर्ट के सामने पेश हुए। याची सोनम व सोमी की ये याचिका प्रथम सूचना रिपोर्ट अंतर्गत धारा ३६३, ३६६ भारतीय दण्ड संहिता रद्द करने तथा याची संख्या १ के पिता प्रतिवादी सं० ४ से संरक्षण प्राप्त करने हेतु दाखिल की।

“याची सं० १ कुमारी सोनम से पूछा गयाः क्या आप याची सं० २ के साथ अपनी मर्ज़ी से रह रही है। याची ने उत्तर दिया ‘हाँ’। याची से दूसरा प्रश्न किया गयाः क्या आपकी शादी याची के साथ हुई है। उत्तर दिया ‘नहीं’। याची से तीसरा प्रथन पूछा गयाः क्या आपके साथ कोई ज़ोर-जबरजस्ती हुई है।”

जज साहब ने इस पर सोनम को देखा और सोनम ने न में सिर हिला दिया।

जज साहब ने आगे लिखाना फिर से शुरू किया—“जवाब में कुमारी सोनम ने न में सिर को हिलाकर जवाब दिया।

“कुमारी सोनम के द्वारा दी गई गवाही से यह साफ़ है कि याची सं० २ श्री सोमी पर प्रथम सूचना रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद है।”

और जज साहब ने अभियोजन पक्ष की ओर से आए वकील साहब को देखा। सोनम के पिता ने शहर के सबसे बड़े वकील को मुक़दमें में विरोध करने के लिये खड़ा किया था। वकील साहब समझदार थे पर जज साहब इस तरह से कहाँ जाने देने वाले थे।

“अरे, वकील साहब। अपने क्लाइंट की दी हुई फ़ीस को तो जस्टिफ़ाई कर लीजिये।”—जज साहब ने कहा। इस पर कोर्ट में सब लोग हँस पड़े। बस सोनम और सोमी चुपचाप रहे।

“ज़रूर, माई लार्ड। मैं आपका ध्यान याचिका में लगी कुमारी सोनम की हाई स्कूल की मार्कशीट की ओर खींचना चाहता हूँ। आप ने खुद कहा कि कुमारी सोनम की उम्र १३ वर्ष है। ऐसे में कुमारी सोनम को याची संख्या २ के पास नहीं भेजा जा सकता।”—वकील साहब ने कहा।

“ठीक है। मेरे ख्याल से अभियोजन के पास और कुछ भी नहीं।”—जज साहब ने कहा और वो वापस फ़ैसले को सुनाने लगे।—“अभियोजन पक्ष कि ओर से उपस्थित विद्वान निजी अधिवक्ता ने कोर्ट का ध्यान कुमारी सोनम की मार्कशीट की ओर किया और याचिका का विरोध किया।

“मैं याचिका को पूर्णतः नहीं स्वीकार सकता पर इसे पूर्णतः खारिज करना भी न्याय के पक्ष में नहीं होगा। याची सं० २ श्री सोमी के विरुद्ध दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करते हुए न्याय की पूर्ति हो जाएगी। पुलिस को ये आदेश दिया जाता है कि वह याची सं० २ श्री सोमी को किसी भी तरह से तत्कालीन मामले में परेशान नहीं करेगी। साथ ही प्रतिवादी संख्या ४ जो कुमारी सोनम के पिता हैं उनको आदेश दिया जाता है कि वह किसी भी तरह से श्री सोमी या कुमारी सोनम को परेशान नहीं करेंगे। पिता को अपनी पुत्री की सुरक्षा करने का अधिकार है पर यह अधिकार उस सीमा तक है जब तक अधिकार पुत्री के लिये गले का पट्टा न बने।

“अब हमारे सामने दुविधा है कि कुमारी सोनम की उम्र हाई-स्कूल की मार्कशीट के अनुसार तेरह वर्ष है। जूवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा ९४ के अनुसार हाई-स्कूल की मार्कशीट उम्र के निर्धारण में साक्ष्य है। ऐसे में कुमारी सोनम का कहना है कि मार्कशीट पर दर्ज उम्र ग़लत है, नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश होने के कारण मेरा यह दायित्व है कि अगर मेरे निर्णय से किसी निर्दोश का भला न हो तो बुरा भी न हो।

“इस परिस्थिति में मैं कुमारी सोनम को याची सं० २ के साथ रहने की इजाज़त नहीं दे सकता और कुमारी सोनम को बालिग़ होने तक नारी निकेतन में भेजने के निर्णय को न्यायोचित पाता हूँ। यह याचिका इस निर्णय के साथ नास्तिरित की जाती है।”

और सोनम ने सोमी से इजाज़त ली। उसे पता था कि अब वो लंबे समय तक सोमी से न मिल सकेगी।

नारी-निकेतन में रहना कठिन था। डर लगा रहता था कि कहीं उसके पिता नारी-निकेतन में आ कर ज़बरन उसे न ले जाए। उन दिनों में सोनम का एक बहुत ख़ास सहारा था—किताबें। उसे एक बार फिर से अपना सपना दिखाई दे रहा था। कभी वो विधि की पढ़ाई करना चाहती थी पर उसका मन तब टूटा और डर से भरा था। आज वो डर से खुद को मुक्त पा रही थी।

फिर एक दिन उसके पास नारी-निकेतन की निदेशक आई और उन्होंने उसका हाल चाल पूछा। भाग्य से नारी-निकेतन की निदेशक कोई अमीर संस्थापक नहीं, एक वृद्ध महिला थीं जिन्होंने अपना जीवन असहाय महिलाओं के सम्मान की रक्षा में बिता दिया और अंततः अपना पुश्तैनी घर भी नारी-निकेतन के लिये दान कर दिया। उनके प्रेम और समर्पण का असर था कि बड़े-से-बड़े अपराध को कर के आई खलनायका भी उनकी मुरीद होकर उन्हें प्यार से डायरेक्टर दादी कहती थी।

डायरेक्टर दादी ने सोनम को लगन से पढ़ने के साथ सर्वोच्च न्यायालय में अपनी आज़ादी के लड़ने के लिये तैयारी करने की सलाह दी। यह आसान नहीं था। सोनम जितना को न्याय व्यवस्था को समझने की कोशिश करती, वो उतनी ही निराश होती जाती। कोई उसका साथी था तो वह था भारत का संविधान। न्याय व्यवस्था को क़रीब से जानकर उसने पाया कि कैसे समाज विसंगतियों से भरा पड़ा है। उसने पाया कि सबसे महिलाओंः-

  • लड़के को इक्कीस साल से पहले क़ानूनन शादी करने की इजाज़त नहीं थी पर लड़की को उसके माता-पिता अठ्ठारह की होते ही शादी में ढकेल सकते है।
  • अट्ठारह साल की लड़की से शारीरिक संबंध बलात्कार कहलाता है पर अगर माता-पिता बारह साल की लड़की को भी किसी साठ साल के बुड्ढें से बाँध दें तो वो वैध है।
  • निचली अदालतें समाज के आनर किंलिग करने वालों पर समाज की सहानभूति के कारण पर सख़्त नहीं हैं।
  • ग़रीब अभियुक्त के फाँसी पर झूलने की संभावना अमीर के मुक़ाबले ज़्यादा है।
  • अमीर बड़े वकील करके बच जाता है पर ग़रीब को सिर्फ़ भगवान के सहारा का भ्रम मिलता है।
  • राष्ट्रगान गाना सम्मान का विषय है पर सम्मानपूर्वक अपनी बात रखना देशद्रोह।
  • ध्वज का सम्मान है पर मनुष्य का नहीं।
  • गाय का सम्मान है पर मनुष्य का नहीं।
  • केवल प्रतीकों के लिये लोग मरना चाहते हैं, पर लोग चाहे जितना मरते रहें किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था।

पर सोनम को जज साहब की वो बात याद थी जिसमें उन्होंने कहा था कि वे निर्दोष का नुक़सान नहीं करेंगे। और उन्होंने ऐसा किया भी। सोमी निर्दोष था और उसको जज साहब ने सजा से बचाया।

सोनम को संविधान को पढ़कर पता चला कि अगर कोई भी मर्जी के ख़िलाफ़ रखता है तो व्यक्ति क़ानून की मदद ले सकता है। सोनम को क़ानून पढ़कर ये बात तो समझ आ गई को वह खुद को बालिग़ सिद्ध करके आज़ादी पा सकती है। उसने सत्यमेव जयते को सिर माथे पर लगाया और संविधान के अनुच्छेद ३२ के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका डाल दी। उसकी दलील साफ़ थी—उसके पिता ने हाईस्कूल में उसकी उम्र कम बता के लिखाई थी, और ऐसे में नारी-निकेतन में उसे बंद रखने का किसी को कोई अधिकार नहीं था। दलील सच्ची और सधी हुई थी। अनेकों बार कोर्ट भी देख चुकी थी कि कैसे माता-पिता सरकारी नौकरियों में फ़ायदे के लिये बच्चों की उम्र कम लिखाते हैं।

आदेश हुआ कि मेडिकल किया जाए। मेडिकल हुआ और सारा मामला साफ़ हो गया। मनुष्य झूठ बोल सकता है पर विज्ञान नहीं। मेडिकल में उम्र 19-24 के बीच की निकल कर आई। सत्य की जय हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने नज़ीर दी कि मेडिकल और स्कूल सर्टिफ़िकेट में मेडिकल ही सत्य माना जाएगा।

वो रात सोनम की नारी-निकेतन में आख़िरी रात थी। आदेश की प्रति नारी-निकेतन के पास लेकर सोमी आने वाला था।

“सोनम। तुम्हें लेने के लिये सोमी आ चुका है।”—डायरेक्टर दादी ने सोनम को बताया।

“जी दादी।”—सोनम ने कहा और वो अपने लगे हुए बैग को उठा कर नीचे पहुँची।

सोमी को वो छः माह बाद देख रही थी। इस बीच में वो पूरी तरह बदल गया था। उसके चेहरे पर थकान थी पर वो ख़ुश था। सोनम के मन में एक आवाज़ थी जो शायद उससे कुछ कह रही थी।

“आज़ादी मुबारक हो, सोनम। मैं आदेश की प्रति लेकर आया था।”—सोमी ने उससे कहा।

“सिर्फ़ प्रति देने आए थे?”—सोनम ने पूछा।

“बस्ती के बच्चे तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। मैं ने ज़मीन लेकर पक्का मकान बना लिया है। नीचे पाठशाला चलती है। दूसरे माले पर चार कमरे हैं। क्या तुम पाठशाला की टीचर बनोगी? तनख़्वाह वग़ैरह सब मिलेगी। रहने पर कोई किराया देने की भी ज़रूरत नहीं होगी। सरकार की तरफ़ से अनुदान मिलने की उम्मीद न हो पर बस्ती के लोग बच्चों को फ़ीस देकर पढ़ाते हैं। मेरे ख्याल से एक और टीचर की जो जगह है वह तुम्हारी है।”—सोमी ने कहा।

“सोनम। क्या हम दोबारा तुम्हें मिल सकेंगे?”—डायरेक्टर दादी ने पूछा।

“मुझे नहीं लगता, अब आपको ही मेरे घर आना होगा। मैं फ़ोन पर बातें करती रहूँगी।”—सोनम ने कहा और वो डायरेक्टर दादी से गले लगने के बाद सोमी के साथ नारी-निकेतन के बाहर निकल गई। वहाँ सोनम को बाइक दिखी। बाइक ज़्यादा पुरानी नहीं थी।ज़रूर कुछ तो बदला था।

“तो टीचर जी बनाना चाहते हो तुम मुझे।”—सोनम ने पूछा।

“बस्ती में रुकने की कोई शर्त नहीं।”—सोमी ने बाइक पर चढ़ते हुए पूछा। वो यक़ीनन उसका सामना नहीं करना चाहता था।

“मेरी है।”—सोनम ने कहा।

“क्या शर्त है?”—सोमी ने उत्सुकता से पूछा।

“मुझे तुम अपने कमरे में रहने दोगे… अपने साथ।”—सोनम ने कहा और वो सोमी के साथ बाइक पर बैठ गई।मन ही मन सोनम को लग रहा था कि वो अब बड़ी उम्र की हो गई थी—उसने अपने लिये पहला आज़ाद फ़ैसला जो किया था।


नौ की जगह दस बज गए। बहुत काम था आज। तो कैसी लगी आपको हमारी कहानी? अपने विचार टिप्पणी में लिख कर बताएँ।

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